# एक और महाप्रलय की तैयारी #

मित्रों बड़े दिनों से सोच रहा था कुछ नया लिखने को,,,,अचानक आज केदार बाबा के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । बाबा के दर्शन पा कर मन को बड़ी शान्ति मिली । परन्तु मन्दिर के चारों ओर हो रहे अन्दाधुन्द निर्माण कार्य से मन बिचलित हो गया । सोच रहा हूँ किसी ने ठीक ही कहा है,,,,,"विनाश काले विपरीत बुद्धी",,,,,,हम २०१३ के उस प्रलयंकारी घटना से कुछ भी सबक नहीं ले पाये । धिक्कार है ऐसे नीति निर्धारकों के लिये । क्या इस देश में जीवन का कोई मोल नहीं ? या फिर इन लोगों ने ये मान लिया कि चन्द काग़ज़ी रुपयों के ख़ातिर वे सैकड़ों वर्ष पुरानी हमारी इस संस्कृति को निस्ते नाबूत कर देंगे ? उदाहरण के लिये दो फ़ोटो पेश कर रहा हूँ जिसे देखकर शायद एक अनपढ़ भी समझ जायेगा कि केदारपुरी में आजकल क्या पक रहा है । एक भूविज्ञान के छात्र होने के नाते मैं तो सिर्फ़ इतना कह सकता हूँ कि यहाँ जो भी हो रहा है वो ठीक नहीं है । घाटी जहाँ एक ओर हिमनद के द्वारा लाये गये गाद (हिमोढ) से भरी पड़ी है वही दूसरी ओर वातावरण में बढ़ते तापमान के कारण पिघलते हिमनद एवं बढ़ती अत्यधिक वर्षा के कारण उच्च हिमालयी क्षेत्र में एकत्रित इन हिमोढ को बड़ी तीव्रता के साथ निम्न हिमालयी क्षेत्र में वहाकर लाती है । जो कि कभी कभी विकराल रूप धारण कर जान माल को भारी क्षति पहुँचाती है । केदार घाटी में हिम आवधाव (एवलान्च) के मुहानों पर आनन फ़ानन में वने भवन इन्हीं हिमोढ के ऊपर हैं जोकि इस घाटी के लिये फिर से महाविनाशकारी साबित हो सकता है ।,,,,,,,,अत: सावधान,,,,,!

Comments

  1. "हम २०१३ के उस प्रलयंकारी घटना से कुछ भी सबक नहीं ले पाये " - ये सिर्फ इसी मसले पर नहीं लेकिन बहुत सारे या ये कहना ठीक होगा कि लगभग सभी सवालों पर हम किसी भी दुर्घटना से सीखते नहीं दीखते, और बार-बार के बावजूद सीखते नहीं दीखते। और ये इसलिए की "हम सीखना ही नहीं चाहते।" हमने अज्ञानता में ही रहना स्वीकार कर लिया है। पैसे और सत्ता का लोभ में हम और कुछ देखना ही नहीं चाह रहे हैं। अमरीकी लेखक जॉर्ज सन्त्याना का कहा है, "जो लोग इतिहास से नहीं सीखते, वे उसे दोहराने के लिए अभिशप्त होते हैं।"

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